(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Mahabharata - Drona Parva


॥ श्रीः ॥
7.162. अध्यायः 162
Mahabharata - Drona Parva - Chapter Topics
सङ्कुलयुद्धवर्णनम्॥ 1 ॥


Mahabharata - Drona Parva - Chapter Text

सञ्जय उवाच। 7-162-0x(4706)(52373)
ततो युधिष्ठिरश्चैव भीमसेनश्च पाण्डवः।
द्रोणपुत्रं महाराज समन्तात्पर्यवारयन्॥ 7-162-1(52374)
ततो दुर्योधनो राजा भारद्वाजेन संवृतः।
अभ्ययात्पाण्डवान्सङ्ख्ये ततो युद्धमवर्तत।
घोररूपं महाराज भीरूणां भयवर्धनम्॥ 7-162-2(52375)
अम्बष्ठान्मालवान्वङ्गाञ्छिबींस्त्रैगर्तकानपि।
प्राहिणोन्मृत्युलोकाय गणान्क्रुद्धो वृकोदरः॥ 7-162-3(52376)
अभीषाहाञ्छूरसेनान्क्षत्रियान्युद्धदुर्मदान्।
निकृत्त्य पृथिवीं चक्रे भीमः शोणितकर्दमाम्॥ 7-162-4(52377)
यौधेयानद्रिजान्राजन्मद्रकान्मालवानपि।
प्राहिणोन्मृत्युलोकाय किरीटी निशितैः शरैः॥ 7-162-5(52378)
प्रगाढमञ्चोगतिभिर्नाराचैरभिताडिताः।
निपेतुर्द्विरदा भूमौ द्विशृङ्गा इव पर्वताः॥ 7-162-6(52379)
निकृत्तैर्हस्तिहस्तैश्च चेष्टमानैरितस्ततः।
रराज वसुधाऽऽकीर्णा विसर्पद्भिरिवोरगैः॥ 7-162-7(52380)
क्षिप्तैः कनकचित्रैश्च नृपच्छत्रैः क्षितिर्बभौ।
द्यौरिवादित्यचन्द्राद्यैर्ग्रहैः कीर्णा युगक्षये॥ 7-162-8(52381)
हत प्रहरताभीता विध्यत व्यवकृन्तत।
इत्यासीत्तुमुलः शब्दः शोणाश्वस्य रथं प्रति॥ 7-162-9(52382)
द्रोणस्तु परमक्रुद्धो वायव्यास्त्रेण संयुगे।
व्यधमत्तान्महवायुर्मेघानिव दुरत्ययः॥ 7-162-10(52383)
ते हन्यमाना द्रोणेन पाञ्चालाः प्राद्रवन्भयात्।
पश्यतो भीमसेनस्य पार्थस्य च महात्मनः॥ 7-162-11(52384)
ततः किरीटि भीमश्च सहसा सन्न्यवर्तताम्।
महता रथवंशेन परिगृह्य बलं महत्॥ 7-162-12(52385)
बीभत्सुर्दक्षिणं वार्श्वमुत्तरं तु वृकोदरः।
भारद्वाजं शरौघाभ्यां महद्भामभ्यवर्षताम्॥ 7-162-13(52386)
तौ तथा सृञ्जयाश्चैव पाञ्चालाश्च महौजसः।
अन्वगच्छन्महाराज मात्स्यैश्च सह सोमकैः॥ 7-162-14(52387)
तथैव तव पुत्रस्य रथोदाराः प्रहारिणः।
महत्या सेनया राजञ्जग्मुर्द्रोणरथं प्रति॥ 7-162-15(52388)
ततः सा भारती सेना हन्यमाना किरीटिना।
तमसा निद्रया चैव पुनरेव व्यदीर्यत॥ 7-162-16(52389)
द्रोणेन वार्यमाणास्ते स्वयं तव सुतेन च।
नाशक्यन्त महाराज योधा वारयितुं तदा॥ 7-162-17(52390)
सा पाण्डुपुत्रस्य शरैर्दीर्यमाणा महाचमूः।
तमसा संवृते लोके व्यद्रवत्सर्वतोमुखी॥ 7-162-18(52391)
उत्सृज्य शतशो वाहांस्तत्र केचिन्नराधिपाः।
प्राद्रवन्त महाराज भयाविष्टाः समन्ततः॥ ॥ 7-162-19(52392)

इति श्रीमन्महाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि चतुर्दशरात्रियुद्धे द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ 162 ॥


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